बज़्म-ए-मातम तो नहीं बज़्म-ए-सुख़न है 'हाली' याँ मुनासिब नहीं रो रो के रुलाना हरगिज़

“This is a gathering of verse, O Hali, not an assembly of grief; / It is not at all fitting here to weep, and make others weep.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

ऐ हाली, यह शायरी की महफ़िल है, कोई मातम की मजलिस नहीं; यहाँ ख़ुद रोना और दूसरों को रुलाना बिल्कुल ठीक नहीं है।

विस्तार

हाली यहाँ बहुत नफ़ासत से शायरी की महफ़िल के आदाब और गरिमा को याद दिला रहे हैं। मुशायरा अल्फ़ाज़, हुस्न और गहरी सोच का जश्न होता है, कोई मातम की जगह नहीं जहाँ बस आँसू ही बहाए जाएँ। शायरी में दर्द का अहसास ज़रूर होना चाहिए, मगर उसे इस तरह रो-रोकर पेश करना कि महफ़िल ही बोझिल हो जाए, अदब के सलीक़े के ख़िलाफ़ है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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