ग़ज़ल
जीते जी मौत के तुम मुँह में न जाना हरगिज़
جیتے جی موت کے تم منہ میں نہ جانا ہرگز
इस ग़ज़ल में शायर अपने दोस्तों को इश्क़ के ख़तरनाक अंजाम से आगाह करते हुए दिल न लगाने की पुरज़ोर ताकीद करता है। वह मुहब्बत को जीते-जी मौत के मुँह में क़दम रखने और शेर से आँखें मिलाने जैसा जानलेवा ख़तरा क़रार देता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
जीते जी मौत के तुम मुँह में न जाना हरगिज़
दोस्तो दिल न लगाना न लगाना हरगिज़
ऐ दोस्तो, जीते-जी खुद को मौत के मुँह में मत डालना और कभी किसी से दिल मत लगाना।
2
इश्क़ भी ताक में बैठा है नज़र-बाज़ों की
देखना शेर से आँखें न लड़ाना हरगिज़
इश्क़ भी नज़रबाज़ों की घात में बैठा है, इसलिए संभल कर रहना और कभी शेर से आँखें मत मिलाना।
3
हाथ मलने न हों पीरी में अगर हसरत से
तो जवानी में न ये रोग बसाना हरगिज़
अगर बुढ़ापे में पछतावे से हाथ नहीं मलना चाहते, तो जवानी में कभी भी (इश्क़ का) यह रोग मत पालना।
4
जितने रस्ते थे तिरे हो गए वीराँ ऐ इश्क़
आ के वीरानों में अब घर न बसाना हरगिज़
हे इश्क़, तुम्हारे जितने भी रास्ते थे वे सब वीरान हो चुके हैं; अब इन वीरानियों में आकर कभी अपना घर मत बसाना।
5
कूच सब कर गए दिल्ली से तिरे क़द्र-शनास
क़द्र याँ रह के अब अपनी न गँवाना हरगिज़
तुम्हारी क़द्र करने वाले सभी लोग दिल्ली छोड़कर जा चुके हैं, इसलिए अब यहाँ रहकर किसी भी हाल में अपनी क़ीमत मत खोना।
6
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़
हे दोस्त, उजड़ चुकी स्वर्गीय दिल्ली का ज़िक्र मत छेड़, क्योंकि हम से यह दर्दनाक दास्तान बिल्कुल नहीं सुनी जाएगी।
7
ढूँडता है दिल-ए-शोरीदा बहाने मुतरिब
दर्द-अंगेज़ ग़ज़ल कोई न गाना हरगिज़
हे गायक, यह व्याकुल दिल तो रोने के बहाने ढूँढ ही रहा है, इसलिए भूलकर भी कोई दर्द भरी ग़ज़ल मत गाना।
8
सोहबतें अगली मुसव्विर हमें याद आएँगी
कोई दिलचस्प मुरक़्क़ा न दिखाना हरगिज़
हे चित्रकार, हमें कभी कोई आकर्षक चित्रों का संग्रह मत दिखाना, क्योंकि उसे देखकर हमें पिछली सोहबतें और पुरानी महफ़िलें याद आ जाएँगी।
9
ले के दाग़ आएगा सीने पे बहुत ऐ सय्याह
देख इस शहर के खंडरों में न जाना हरगिज़
ऐ मुसाफ़िर, तू अपने सीने पर बहुत से दाग़ और ज़ख़्म लेकर लौटेगा, इसलिए ख़बरदार रहना और इस शहर के खंडहरों में कभी मत जाना।
10
चप्पे चप्पे पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाक
दफ़्न होगा कहीं इतना न ख़ज़ाना हरगिज़
यहाँ चप्पे-चप्पे पर मिट्टी के नीचे बेमिसाल और अनमोल मोती दफ़्न हैं। इतना बड़ा ख़ज़ाना दुनिया में कहीं और कभी दफ़्न नहीं हुआ होगा।
11
मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तो
ऐ फ़लक इस से ज़ियादा न मिटाना हरगिज़
अब तो तेरे मिटाने के निशान भी पूरी तरह मिट चुके हैं, इसलिए ऐ आसमान! अब मुझे इससे ज़्यादा हरगिज़ मत मिटाना।
12
वो तो भूले थे हमें हम भी उन्हें भूल गए
ऐसा बदला है न बदलेगा ज़माना हरगिज़
वे तो हमें भूल ही चुके थे, इसलिए हमने भी उन्हें भुला दिया; ज़माने ने ऐसा बदला न तो कभी लिया है और न कभी लेगा।
13
हम को गर तू ने रुलाया तो रुलाया ऐ चर्ख़
हम पे ग़ैरों को तो ज़ालिम न हँसाना हरगिज़
ऐ आसमान, अगर तूने हमें रुलाया है तो कोई बात नहीं, लेकिन ऐ ज़ालिम, हमारे हाल पर कभी ग़ैरों को मत हँसाना।
14
आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ी
भर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़
हे साक़ी! तुम्हें क़सम है कि शराब के इस आख़िरी दौर में भी प्यासों को कभी भर कर एक जाम मत पिलाना।
15
बख़्त सोए हैं बहुत जाग के ऐ दौर-ए-ज़माँ
न अभी नींद के मातों को जगाना हरगिज़
ऐ ज़माने के दौर, मेरी किस्मत बहुत जागने के बाद अब जाकर सोई है; नींद में डूबे हुओं को अभी बिल्कुल मत जगाना।
16
कभी ऐ इल्म ओ हुनर घर था तुम्हारा दिल्ली
हम को भूले हो तो घर भूल न जाना हरगिज़
ऐ ज्ञान और कला, कभी दिल्ली तुम्हारा घर हुआ करता था; भले ही तुम हमें भूल गए हो, लेकिन अपने इस घर को कभी मत भूलना।
17
शाइरी मर चुकी अब ज़िंदा न होगी यारो
याद कर कर के उसे जी न कुढ़ाना हरगिज़
हे दोस्तो, शाइरी अब मर चुकी है और दोबारा ज़िंदा नहीं होगी, इसलिए उसे याद कर-करके अपना दिल बिल्कुल मत दुखाना।
18
'ग़ालिब' ओ 'शेफ़्ता' ओ 'नय्यर' ओ 'आज़ुर्दा' ओ 'ज़ौक़'
अब दिखाएगा ये शक्लें न ज़माना हरगिज़
ग़ालिब, शेफ़्ता, नय्यर, आज़ुर्दा और ज़ौक़—ज़माना अब ऐसी हस्तियों को दोबारा कभी नहीं दिखाएगा।
19
'मोमिन' ओ 'अल्वी' ओ 'सहबाई' ओ 'ममनूँ' के बाद
शेर का नाम न लेगा कोई दाना हरगिज़
मोमिन, अल्वी, सहबाई और ममनून के बाद कोई भी समझदार व्यक्ति कभी शायरी का नाम तक नहीं लेगा।
20
कर दिया मर के यगानों ने यगाना हम को
वर्ना याँ कोई न था हम में यगाना हरगिज़
हमारे अपनों और रिश्तेदारों ने मर कर हमें अकेला और बेमिसाल बना दिया, वर्ना यहाँ हममें से कोई भी कभी बेमिसाल नहीं था।
21
'दाग़' ओ 'मजरूह' को सुन लो कि फिर इस गुलशन में
न सुनेगा कोई बुलबुल का तराना हरगिज़
दाग़ और मजरूह को सुन लो, क्योंकि इसके बाद इस बाग़ में कोई कभी बुलबुल का तराना नहीं सुन सकेगा।
22
रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बर
अब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़
रात ख़त्म हो गई और महफ़िल बिखर कर तितर-बितर हो गई। अब तुम रात का वह आनंद फिर कभी नहीं देख पाओगे।
23
बज़्म-ए-मातम तो नहीं बज़्म-ए-सुख़न है 'हाली'
याँ मुनासिब नहीं रो रो के रुलाना हरगिज़
ऐ हाली, यह शायरी की महफ़िल है, कोई मातम की मजलिस नहीं; यहाँ ख़ुद रोना और दूसरों को रुलाना बिल्कुल ठीक नहीं है।
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