“After Momin, Alvi, Sahbai, and Mamnoon have gone, no one of wisdom shall ever speak the name of verse again.”
मोमिन, अल्वी, सहबाई और ममनून के बाद कोई भी समझदार व्यक्ति कभी शायरी का नाम तक नहीं लेगा।
यह शेर दिल्ली के उस सुनहरे दौर के अज़ीम शायरों—मोमिन, अल्वी, सहबाई और ममनूँ—को याद करके एक गहरा अफ़सोस ज़ाहिर करता है। शायर का मानना है कि इन उस्तादों के जाने के बाद शायरी का असल मयार और हुस्न हमेशा के लिए रुख़सत हो चुका है। अब जो कोई भी शायरी की गहराई और फ़न को समझता है, वह इन बुज़ुर्गों के बाद किसी और के कलाम को शेर कहने की हिम्मत ही नहीं करेगा।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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