आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ी भर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़

“Even in this final round, I bind you by an oath, O Cupbearer: / Never serve a brimming cup to quench the thirsty.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

हे साक़ी! तुम्हें क़सम है कि शराब के इस आख़िरी दौर में भी प्यासों को कभी भर कर एक जाम मत पिलाना।

विस्तार

यहाँ शायर साक़ी से एक अनोखी गुज़ारिश कर रहा है कि महफ़िल के आख़िरी दौर में भी प्यासों की प्यास मत बुझाना। उर्दू शायरी में 'तश्नगी' यानी अधूरी चाहत और तड़प को तृप्ति से कहीं ऊँचा दर्जा दिया गया है, क्योंकि प्यास बुझते ही इश्क़ और जुस्तजू की आग ठंडी पड़ जाती है। आशिक़ चाहता है कि उसकी यह बेचैनी और तलब आख़िरी सांस तक बरक़रार रहे, चाहे उसे खाली हाथ ही इस दुनिया से रुख़सत होना पड़े।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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