“Listen to Dāgh and Majrooh now, for never again in this garden shall anyone hear the nightingale's song.”
दाग़ और मजरूह को सुन लो, क्योंकि इसके बाद इस बाग़ में कोई कभी बुलबुल का तराना नहीं सुन सकेगा।
शायर यहाँ दाग़ देहलवी और मजरूह सुल्तानपुरी जैसे उस्ताद शायरों को बुलबुल और शायरी की दुनिया को एक गुलशन की तरह पेश कर रहे हैं। शेर में एक गहरा दर्द और ताकीद है कि इस मीठी ज़बान और ख़ालिस तरन्नुम की क़द्र कर लो, क्योंकि ऐसे फ़नकार रोज़-रोज़ पैदा नहीं होते। यह सिर्फ़ उनकी तारीफ़ नहीं, बल्कि एक सुनहरे साहित्यिक दौर के ख़त्म होने का अफ़सोस और उस विरासत को संजोने की पुरख़ुलूस पुकार है।
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