तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़ न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़

“Do not bring up the memory of late Delhi, my friend; never will we be able to bear hearing this tragic tale.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

हे दोस्त, उजड़ चुकी स्वर्गीय दिल्ली का ज़िक्र मत छेड़, क्योंकि हम से यह दर्दनाक दास्तान बिल्कुल नहीं सुनी जाएगी।

विस्तार

इस बेहद मार्मिक शेर में शायर ने दिल्ली को महज़ एक शहर नहीं, बल्कि किसी गुज़र चुके अज़ीज़ इंसान की तरह 'देहली-ए-मरहूम' यानी स्वर्गीय दिल्ली कहा है। 1857 के इंक़लाब के बाद जिस तरह दिल्ली की तहज़ीब और रौनकें उजड़ीं, उसका ग़म शायर के सीने में एक गहरा नासूर बनकर बैठा है। वह अपने दोस्त से गुज़ारिश करता है कि उस उजड़े हुए शहर का ज़िक्र न छेड़े, क्योंकि उस ख़ूबसूरत माजी की दास्तान सुनना अब उसके नाज़ुक दिल के बस में नहीं रहा।

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