जितने रस्ते थे तिरे हो गए वीराँ ऐ इश्क़ आ के वीरानों में अब घर न बसाना हरगिज़

“All the pathways that once were yours have turned desolate, O Love; never come now to make your home amidst these ruins.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

हे इश्क़, तुम्हारे जितने भी रास्ते थे वे सब वीरान हो चुके हैं; अब इन वीरानियों में आकर कभी अपना घर मत बसाना।

विस्तार

इस शेर में शायर इश्क़ से एक थके हुए मुसाफ़िर की तरह मुख़ातब है, जो अब और दर्द सहने की ताक़त खो चुका है। 'रस्ते' यहाँ उम्मीदों और जज़्बातों की उन राहों का प्रतीक हैं, जो कभी आबाद थीं मगर अब उजड़कर वीराना बन चुकी हैं। शायर इश्क़ से सीधे कह रहा है कि इस टूटे हुए दिल के खंडहर में अब दोबारा कभी अपना बसेरा मत बनाना, क्योंकि यहाँ अब फिर से बिखरने की गुंजाइश नहीं बची।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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