“Failure in our goal, perhaps, with patience we might endure; yet the ache of self-will remains a wound we find without a cure.”
अगर मक़सद में नाकामी मिले तो हम सब्र कर सकते हैं, लेकिन अपनी ही मनमानी और स्वार्थ के दर्द को हम लाइलाज पाते हैं।
शायर यहाँ दो तरह के दर्दों का फ़र्क़ समझाते हैं—एक दुनियावी मक़सद में नाकामी का ग़म और दूसरा अपनी ही ज़िद या मनमर्ज़ी से उपजा संताप। किसी लक्ष्य को न पा सकने की तकलीफ़ तो इंसान सब्र करके और वक़्त के साथ भुला सकता है, लेकिन अपनी 'ख़ुद-कामी' यानी अहंकार और बेलगाम ख़्वाहिशों की जो चुभन होती है, उसका कोई इलाज नहीं मिलता। यह शेर हमें याद दिलाता है कि बाहरी हार से उबरना आसान है, मगर अपनी ही अंतर्मन की ज़िद से मिला घाव कभी नहीं भरता।
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