ग़ज़ल
ख़ूबियाँ अपने में गो बे-इंतिहा पाते हैं हम
خوبیاں اپنے میں گو بے انتہا پاتے ہیں ہم
यह ग़ज़ल आत्मनिरीक्षण, विनम्रता और मानवीय कमियों का मार्मिक चित्रण करती है। इसमें शायर अपनी ख़ूबियों को स्वीकारते हुए भी हर अच्छाई में छिपे ऐब और अपने अंतर्मन तथा बाहरी आचरण के अंतर्विरोध को उजागर करता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
ख़ूबियाँ अपने में गो बे-इंतिहा पाते हैं हम
पर हर इक ख़ूबी में दाग़ इक ऐब का पाते हैं हम
यद्यपि हम अपने भीतर अनगिनत अच्छाइयाँ पाते हैं, फिर भी अपनी हर एक अच्छाई में हमें किसी न किसी ख़ामी या ऐब का दाग़ दिखाई देता है।
2
ख़ौफ़ का कोई निशाँ ज़ाहिर नहीं अफ़आ'ल में
गो कि दिल में मुत्तसिल ख़ौफ़-ए-ख़ुदा पाते हैं हम
यद्यपि हम अपने दिल में निरंतर ईश्वर का भय महसूस करते हैं, फिर भी हमारे कर्मों में इस भय का कोई निशान दिखाई नहीं देता।
3
करते हैं ताअ'त तो कुछ ख़्वाहाँ नुमाइश के नहीं
पर गुनह छुप छुप के करने में मज़ा पाते हैं हम
अगर हम इबादत या आज्ञाकारिता करते हैं तो दिखावे की चाह नहीं रखते, लेकिन छुप-छुप कर गुनाह करने में हमें मज़ा आता है।
4
दीदा ओ दिल को ख़यानत से नहीं रख सकते बाज़
गरचे दस्त-ओ-पा को अक्सर बे-ख़ता पाते हैं हम
हम अपनी आँखों और दिल को ख़यानत से रोक नहीं पाते, हालाँकि अपने हाथ और पैरों को अक्सर बेक़सूर पाते हैं।
5
दिल में दर्द-ए-इश्क़ ने मुद्दत से कर रक्खा है घर
पर उसे आलूदा-ए-हिर्स-ओ-हवा पाते हैं हम
इश्क़ के दर्द ने लंबे समय से दिल में अपना बसेरा बना रखा है, लेकिन हम उसे लालच और सांसारिक इच्छाओं से दूषित पाते हैं।
6
हो के नादिम जुर्म से फिर जुर्म करते हैं वही
जुर्म से गो आप को नादिम सदा पाते हैं हम
यद्यपि हम अपने किए हुए जुर्म पर खुद को हमेशा शर्मिंदा पाते हैं, फिर भी उस पछतावे के बाद हम वही जुर्म दोबारा कर बैठते हैं।
7
हैं फ़िदा उन दोस्तों पर जिन में हो सिद्क़ ओ सफ़ा
पर बहुत कम आप में सिद्क़ ओ सफ़ा पाते हैं हम
हम ऐसे दोस्तों पर न्योछावर हैं जिनमें सच्चाई और निष्कपटता हो, लेकिन आप में हमें यह सच्चाई और पाकीज़गी बहुत कम नज़र आती है।
8
गो किसी को आप से होने नहीं देते ख़फ़ा
इक जहाँ से आप को लेकिन ख़फ़ा पाते हैं हम
यद्यपि आप किसी को भी अपने आप से नाराज़ नहीं होने देते, फिर भी हम देखते हैं कि आप स्वयं पूरी दुनिया से नाराज़ रहते हैं।
9
जानते अपने सिवा सब को हैं बे-मेहर ओ वफ़ा
अपने में गर शम्मा-ए-मेहर-ओ-वफ़ा पाते हैं हम
अगर हम अपने अंदर ज़रा सी भी मोहब्बत और वफ़ादारी पाते हैं, तो अपने सिवा बाकी सभी को बेमहर और बेवफ़ा समझने लगते हैं।
10
बुख़्ल से मंसूब करते हैं ज़माने को सदा
गर कभी तौफ़ीक़-ए-ईसार ओ अता पाते हैं हम
जब कभी हमें त्याग करने और देने का सामर्थ्य मिलता है, तो हम हमेशा दुनिया को कंजूसी का दोषी ठहराने लगते हैं।
11
हो अगर मक़्सद में नाकामी तो कर सकते हैं सब्र
दर्द-ए-ख़ुद-कामी को लेकिन बे-दवा पाते हैं हम
अगर मक़सद में नाकामी मिले तो हम सब्र कर सकते हैं, लेकिन अपनी ही मनमानी और स्वार्थ के दर्द को हम लाइलाज पाते हैं।
12
ठहरते जाते हैं जितने चश्म-ए-आलम में भले
हाल नफ़्स-ए-दूँ का उतना ही बुरा पाते हैं हम
दुनिया की नज़रों में हम जितने भले और नेक साबित होते जाते हैं, अपने नीच मन (नफ़्स) की हालत उतनी ही बुरी पाते हैं।
13
जिस क़दर झुक झुक के मिलते हैं बुज़ुर्ग ओ ख़ुर्द से
किब्र ओ नाज़ उतना ही अपने में सिवा पाते हैं हम
हम बड़ों और छोटों से जितनी आज़िज़ी के साथ झुककर मिलते हैं, उतना ही अपने भीतर घमंड और तकब्बुर बढ़ता हुआ पाते हैं।
14
गो भलाई करके हम-जिंसों से ख़ुश होता है जी
तह-नशीं उस में मगर दुर्द-ए-रिया पाते हैं हम
यद्यपि अपने जैसे इंसानों के साथ भलाई करने से दिल को ख़ुशी मिलती है, लेकिन हम उसके अंदर दिखावे और पाखंड की मैल छिपी हुई पाते हैं।
15
है रिदा-ए-नेक-नामी दोश पर अपने मगर
दाग़ रुस्वाई के कुछ ज़ेर-ए-रिदा पाते हैं हम
हालाँकि हमारे कंधों पर नेकनामी की चादर है, मगर उस चादर के नीचे हम बदनामी के कुछ दाग़ पाते हैं।
16
राह के तालिब हैं पर बे-राह पड़ते हैं क़दम
देखिए क्या ढूँढते हैं और क्या पाते हैं हम
हम सही रास्ते की तलाश में हैं लेकिन हमारे कदम भटक जाते हैं; देखना यह है कि हम क्या ढूँढ रहे हैं और हमें क्या मिलता है।
17
नूर के हम ने गले देखे हैं ऐ 'हाली' मगर
रंग कुछ तेरी अलापों में नया पाते हैं हम
ऐ हाली! हमने रोशनी से भरे बहुत से बेहतरीन गले देखे और सुने हैं, लेकिन तुम्हारी अलापों में हमें एक बिल्कुल नया ही रंग मिलता है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
