दीदा ओ दिल को ख़यानत से नहीं रख सकते बाज़ गरचे दस्त-ओ-पा को अक्सर बे-ख़ता पाते हैं हम

“From treachery, we can never hold back the eyes and heart, though hands and feet we often find play a blameless part.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

हम अपनी आँखों और दिल को ख़यानत से रोक नहीं पाते, हालाँकि अपने हाथ और पैरों को अक्सर बेक़सूर पाते हैं।

विस्तार

यह शेर इंसान के ज़ाहिरी सलीके और भीतरी कमज़ोरी के बीच की कशमकश को बहुत सादगी से बयां करता है। शायर कहता है कि भले ही हमारे हाथ और पाँव दुनिया की नज़र में कोई ग़लती न करें और पूरी तरह पाक-साफ़ रहें, लेकिन आँखें और दिल हमेशा बहक जाते हैं और ख़ामोशी से किसी ख़्वाहिश में ख़यानत कर बैठते हैं। यह शेर दरअसल इंसानी फ़ितरत और दिल की उस बेबसी का सच्चा आईना है जहाँ उसूल अक्सर जज़्बातों के आगे हार जाते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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