“If we offer our devotions, we seek no public display; yet in committing sins in secret, what true delight we find.”
अगर हम इबादत या आज्ञाकारिता करते हैं तो दिखावे की चाह नहीं रखते, लेकिन छुप-छुप कर गुनाह करने में हमें मज़ा आता है।
यह शेर इंसानी फितरत की सच्ची और मासूम कशमकश को बड़े प्यारे अंदाज़ में बयां करता है। शायर कहता है कि जब हम इबादत करते हैं, तो दुनिया को दिखाने या ढोंग रचने की कोई ख्वाहिश नहीं रखते। लेकिन साथ ही वह बड़ी बेबाकी से यह भी कबूल करता है कि दुनिया की नज़रों से छुपकर गुनाह करने का अपना ही एक अलग रोमांच और मज़ा है। इसमें नेकियों की नुमाइश करने वाले ज़ाहिदों पर एक मीठा तंज़ है और इंसान की कमज़ोरियों का सच्चा इक़रार भी।
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