“Let us see, O Sheikh, if the painter can ever trace / The likeness of a flawless mortal—and that too your face!”
देखना है कि चित्रकार तस्वीर बना भी पाता है या नहीं, और वह भी आप जैसे दोषरहित (बे-ऐब) इंसान की सूरत।
इस शेर में शायर ने खुद को पवित्र और मुकम्मल समझने वाले 'शैख़' पर बड़ा ही मीठा और चुटीला तंज़ कसा है। शायर मज़ाक उड़ाते हुए कहता है कि भला कोई चित्रकार ऐसे इंसान की तस्वीर कैसे उतार सकता है जिसमें कोई ख़ामी न हो, और वो भी शैख़ साहब आपकी! हँसी-मज़ाक के इस अंदाज़ में दरअसल यह गहरी बात छिपी है कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा दावा कर ले, कोई भी बशर पूरी तरह बे-ऐब नहीं हो सकता।
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