“My heart finds no peace in this desolate land; who has ever found fulfillment in this transient world?”
इस उजड़े हुए देश में मेरा दिल नहीं लगता। भला इस नश्वर और अस्थायी संसार में कभी किसकी हसरतें पूरी हुई हैं या किसका ठिकाना बन पाया है?
यह शेर आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के गहरे दर्द और बेबसी की आवाज़ है, जो वतन से दूर निर्वासन में तड़प रहे थे। 'उजड़े दयार' से उनका इशारा सिर्फ़ उनकी बर्बाद हुई प्यारी दिल्ली की तरफ़ नहीं, बल्कि इस बेगाना हो चुकी दुनिया की ओर भी है। वे बड़ी सादगी से ज़िंदगी का एक सार्वभौमिक सच सामने रखते हैं कि जब यह पूरी कायनात ही नश्वर और फ़ानी है, तो फिर भला यहाँ किसी का दिल हमेशा के लिए कैसे लग सकता है।
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