ग़ज़ल
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
لگتا نہیں ہے دل مرا اجڑے دیار میں
यह प्रसिद्ध ग़ज़ल संसार की नश्वरता, गहरी उदासी और उजड़े हुए वतन में बेबसी के दर्द को बयां करती है। शायर अपने ज़ख़्मी और टूटे हुए दिल की लाचारी प्रकट करते हुए कहते हैं कि अब इसमें अधूरी हसरतों के लिए कोई जगह नहीं बची है।
Source: rekhta · HI
व्याख्या · हर शेर, अल्फ़ाज़ और मतलब
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1
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में
इस उजड़े हुए देश में मेरा दिल नहीं लगता। भला इस नश्वर और अस्थायी संसार में कभी किसकी हसरतें पूरी हुई हैं या किसका ठिकाना बन पाया है?
2
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में
इन अधूरी इच्छाओं (हसरतों) से कह दो कि वे कहीं और जाकर बस जाएं, क्योंकि इस घायल और दाग़दार दिल में अब इतनी जगह नहीं बची है।
3
काँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँ
ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में
हे माली, बाग़ से काँटों को मत निकालो, क्योंकि ये भी बहार के मौसम में फूलों के साथ ही पले-बढ़े हैं।
4
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में
बुलबुल को न तो माली से कोई शिकायत है और न ही शिकारी से, क्योंकि बहार के मौसम में क़ैद होना उसकी क़िस्मत में ही लिखा था।
5
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
ज़फ़र कितना बदनसीब है कि उसे दफ़न होने के लिए अपने महबूब की गली (वतन) में दो गज़ ज़मीन भी नहीं मिली।
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