“Ever since I became a stranger to everyone, only then did I grow somewhat intimate with the Beloved.”
जब से मैं दुनिया के सभी लोगों से बेगाना और अजनबी हो गया हूँ, तब जाकर कहीं उस महबूब से मेरा कुछ परिचय हो पाया है।
यह शेर इश्क़ और वैराग्य के एक गहरे पहलू को दर्शाता है—जब तक हम दुनिया के शोर से ख़ुद को अलग नहीं करते, तब तक महबूब की सच्ची पहचान मुमकिन नहीं होती। शायर कहता है कि जब उसने बाक़ी सब से अजनबी होना सीख लिया, तभी जाकर उस एक से, चाहे वो ख़ुदा हो या कोई महबूब, दिल का गहरा नाता जुड़ पाया। सच्चा आत्म-बोध और रूहानी क़ुर्बत पाने के लिए सांसारिक बंधनों से यह दूरी ही पहली सीढ़ी बनती है।
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