ग़ज़ल

मैं हूँ आसी कि पुर-ख़ता कुछ हूँ

میں ہوں عاصی کہ پر خطا کچھ ہوں
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 9 shers· radif: कुछ हूँ

यह ग़ज़ल ईश्वर के समक्ष विनम्रता, आत्म-समर्पण और अनन्य भक्ति की भावना को व्यक्त करती है। इसमें कवि अपनी कमियों, पापों और सीमित समझ को स्वीकार करते हुए केवल परमात्मा का बंदा होने में ही अपना अस्तित्व और सार्थकता पाता है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
मैं हूँ आसी कि पुर-ख़ता कुछ हूँ तेरा बंदा हूँ ऐ ख़ुदा कुछ हूँ
चाहे मैं पापी होऊं या गलतियों से भरा हुआ, फिर भी मैं कुछ तो हूँ क्योंकि हे ईश्वर, मैं तेरा बंदा हूँ।
2
जुज़्व ओ कुल को नहीं समझता मैं दिल में थोड़ा सा जानता कुछ हूँ
मैं अंश और समग्र को नहीं समझता, लेकिन अपने दिल में थोड़ा-बहुत कुछ जानता हूँ।
3
तुझ से उल्फ़त निबाहता हूँ मैं बा-वफ़ा हूँ कि बेवफ़ा कुछ हूँ
मैं तुमसे अपनी मोहब्बत निभा रहा हूँ, चाहे मैं वफ़ादार हूँ, बेवफ़ा हूँ या कुछ और।
4
जब से ना-आश्ना हूँ मैं सब से तब कहीं उस से आश्ना कुछ हूँ
जब से मैं दुनिया के सभी लोगों से बेगाना और अजनबी हो गया हूँ, तब जाकर कहीं उस महबूब से मेरा कुछ परिचय हो पाया है।
5
नश्शा-ए-इश्क़ ले उड़ा है मुझे अब मज़े में उड़ा रहा कुछ हूँ
इश्क़ का नशा मुझे अपने साथ उड़ा ले गया है, और अब मैं बेख़ुदी और मस्ती के आलम में सब कुछ उड़ा (लुटा) रहा हूँ।
6
ख़्वाब मेरा है ऐन बेदारी मैं तो उस में भी देखता कुछ हूँ
मेरा ख़्वाब बिल्कुल जागने की तरह ही है, और मैं तो उस ख़्वाब में भी कुछ देख रहा हूँ।
7
गरचे कुछ भी नहीं हूँ मैं लेकिन उस पे भी कुछ न पूछो क्या कुछ हूँ
हालाँकि मैं कुछ भी नहीं हूँ, फिर भी यह न पूछो कि मैं क्या कुछ हूँ।
8
समझे वो अपना ख़ाकसार मुझे ख़ाक-ए-रह हूँ कि ख़ाक-ए-पा कुछ हूँ
काश वे मुझे अपना विनम्र सेवक समझ लें; आख़िर मैं कुछ तो हूँ, चाहे उनके रास्ते की धूल होऊँ या उनके क़दमों की ख़ाक।
9
चश्म-ए-अल्ताफ़ फ़ख़्र-ए-दीं से हूँ ऐ 'ज़फ़र' कुछ से हो गया कुछ हूँ
ऐ ज़फ़र! फ़ख़्र-ए-दीन की मेहरबानी और कृपा-दृष्टि की वजह से मैं पहले जैसा नहीं रहा, बल्कि कुछ से कुछ हो गया हूँ।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.