समझे वो अपना ख़ाकसार मुझे ख़ाक-ए-रह हूँ कि ख़ाक-ए-पा कुछ हूँ

“Would that they deemed me their humble servant; am I dust upon their path, or dust beneath their feet?”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

काश वे मुझे अपना विनम्र सेवक समझ लें; आख़िर मैं कुछ तो हूँ, चाहे उनके रास्ते की धूल होऊँ या उनके क़दमों की ख़ाक।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ की बेपनाह आज़िज़ी और समर्पण का खूबसूरत इज़हार है। महबूब से कोई बड़ा मर्तबा या बराबरी मांगने के बजाय वह बस इतनी चाहत रखता है कि महबूब उसे अपना कोई अदना सा ख़ादिम ही मान ले। धूल के इस गहरे रूपक के ज़रिए शायर कहता है कि चाहे वह उनके रास्ते की ख़ाक हो या क़दमों से लिपटी धूल, महबूब से जुड़े रहने का यह एहसास ही उसके लिए सबसे बड़ा एज़ाज़ है।

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