ग़ज़ल
निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ
نباہ بات کا اس حیلہ گر سے کچھ نہ ہوا
यह ग़ज़ल एकतरफ़ा प्रेम की विवशता और बहानेबाज़ महबूब से वफ़ा की उम्मीद टूटने की गहरी व्यथा को व्यक्त करती है। आशिक़ अपनी तरफ़ से हर मुमकिन कोशिश करता है, मगर प्रियतम की बेरुखी और तक़दीर की मार के आगे सब कुछ व्यर्थ साबित होता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ
इधर से क्या न हुआ पर उधर से कुछ न हुआ
2
जवाब-ए-साफ़ तो लाता अगर न लाता ख़त
लिखा नसीब का जो नामा-बर से कुछ न हुआ
3
हमेशा फ़ित्ने ही बरपा किए मिरे सर पर
हुआ ये और तो उस फ़ित्ना-गर से कुछ न हुआ
4
बला से गिर्या-ए-शब तू ही कुछ असर करता
अगरचे इश्क़ में आह-ए-सहर से कुछ न हुआ
5
जला जला के किया शम्अ साँ तमाम मुझे
बस और तो मुझे सोज़-ए-जिगर से कुछ न हुआ
6
रहीं अदू से वही गर्म-जोशियाँ उस की
इस आह-ए-सर्द और इस चश्म-ए-तर से कुछ न हुआ
7
उठाया इश्क़ में क्या क्या न दर्द-ए-सर मैं ने
हुसूल पर मुझे उस दर्द-ए-सर से कुछ न हुआ
8
शब-ए-विसाल में भी मेरी जान को आराम
अज़ीज़ो दर्द-ए-जुदाई के डर से कुछ न हुआ
9
न दूँगा दिल उसे मैं ये हमेशा कहता था
वो आज ले ही गया और 'ज़फ़र' से कुछ न हुआ
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