ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता

“Such would be the delight of love's game had the flame burned equally in both hearts: neither would you find any peace, nor would I know any rest.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

इस प्रेम-क्रीड़ा का असली मज़ा तब आता जब दोनों तरफ़ बराबर आग लगती, जिससे न तुम्हें कोई चैन मिलता और न मुझे कोई क़रार होता।

विस्तार

मोहब्बत का दर्द तब सबसे ज्यादा खलता है जब वह एकतरफ़ा हो और सारी बेचैनी सिर्फ एक ही हिस्से आए। शायर यहाँ बड़े दिलकश अंदाज़ में कहता है कि इस इश्क़ का असली लुत्फ़ तो तब होता, जब दिल की यह आग दोनों तरफ बराबर दहकती। अगर सुकून खोने की यह मीठी तड़प दोनों के दिलों में एक जैसी होती, तो इस चाहत और बेचैनी का मज़ा ही कुछ और होता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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