“The preacher too, like me, felt tempted by love's call, / Yet seeing its calamities, held back from the fall.”
उपदेशक का मन भी हमारी तरह प्रेम करने के लिए ललचाया तो था, लेकिन प्यार की मुसीबतों और परेशानियों को देख-देख कर वह रुक गया।
इस शे'र में शायर नसीहत देने वाले 'नासेह' पर एक मीठा और गहरा तंज़ करते हैं। सच तो यह है कि दुनिया को अक़्ल का पाठ पढ़ाने वाले इस नासेह का दिल भी हमारी तरह इश्क़ की राह में उतरने को मचल उठा था। मगर जब उसने इस रास्ते की मुसीबतें, दर्द और बर्बादी देखी, तो उसके पाँव डगमगा गए और वह पीछे हट गया। सच्चा आशिक़ और नासेह में यही फ़र्क़ है—आशिक़ फना होने की हिम्मत रखता है, जबकि नासेह सिर्फ़ किनारे पर खड़े होकर डरना जानता है।
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