उस से उट्ठेगी क्या मुसीबत-ए-इश्क़
इब्तिदा को जो इंतिहा जाने
“How could one ever endure the tribulations of love, who mistakes its very beginning for the ultimate end?”
— दाग़ देहलवी
अर्थ
जो व्यक्ति इश्क़ की शुरुआत को ही उसका अंत समझ ले, वह इश्क़ की मुसीबतें और तकलीफें कैसे झेल पाएगा?
विस्तार
यह शेर इश्क़ के लंबे और पुरख़ार सफ़र की हक़ीक़त बहुत सादगी से बयान करता है। शायर उस नादान दिल पर प्यार से तंज़ करता है जो मोहब्बत की पहली ही ठोकर या दर्द को सब कुछ समझ बैठता है। जब कोई शुरुआत के हल्के से इम्तिहान को ही मंज़िल या अंत मान ले, तो भला वह आगे आने वाले हिज्र के भारी तूफ़ानों को कैसे झेल पाएगा?
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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