ग़ज़ल
दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने
دل کو کیا ہو گیا خدا جانے
यह ग़ज़ल दिल की रहस्यमयी उदासी और उसकी बेचैन कैफियत को बयां करती है। शायर लाचारी और संजीदगी के साथ दिल के उस गहरे दर्द को चित्रित करता है, जो न तो किसी से साझा हो पाता है और न ही सुकून पा सकता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने
क्यूँ है ऐसा उदास क्या जाने
दिल को क्या हो गया है यह सिर्फ़ ख़ुदा ही जानता है, और यह इस क़दर उदास क्यों है इसका कारण कोई नहीं जानता।
2
अपने ग़म में भी उस को सरफ़ा है
न खिला जाने वो न खा जाने
वह अपने ग़म में भी कंजूसी बरतता है; वह न तो खुद उस दर्द को झेलना जानता है और न ही किसी दूसरे के साथ बांटना।
3
इस तजाहुल का क्या ठिकाना है
जान कर जो न मुद्दआ' जाने
इस जान-बूझकर अनजान बनने की क्या हद है, जो सब कुछ जानते हुए भी दिल के मक़सद को न समझने का दिखावा करे।
4
कह दिया मैं ने राज़-ए-दिल अपना
उस को तुम जानो या ख़ुदा जाने
मैंने अपने दिल का राज़ बता दिया है; अब उसे तुम जानो या ख़ुदा जाने।
5
क्या ग़रज़ क्यूँ इधर तवज्जोह हो
हाल-ए-दिल आप की बला जाने
आपको क्या ज़रूरत है कि आपका ध्यान इस तरफ़ हो, मेरे दिल की हालत की आपको क्या परवाह होगी।
6
जानते जानते ही जानेगा
मुझ में क्या है अभी वो क्या जाने
वह धीरे-धीरे और वक्त के साथ ही मुझे समझ पाएगा; अभी वह भला क्या जाने कि मेरे भीतर क्या है।
7
क्या हम उस बद-गुमाँ से बात करें
जो सताइश को भी गिला जाने
हम उस शक करने वाले (बदगुमान) इंसान से क्या बात करें, जो तारीफ़ को भी शिकायत ही समझ लेता है।
8
तुम न पाओगे सादा-दिल मुझ सा
जो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने
तुम्हें मेरे जैसा भोला और सीधा-सादा इंसान नहीं मिलेगा, जो तुम्हारी बेरुख़ी और अनदेखी को भी तुम्हारी शर्म और हया समझता है।
9
है अबस जुर्म-ए-इश्क़ पर इल्ज़ाम
जब ख़ता-वार भी ख़ता जाने
इश्क़ के जुर्म पर दोष लगाना व्यर्थ है, जब गुनहगार खुद ही इसे अपनी ग़लती स्वीकार करता हो।
10
नहीं कोताह दामन-ए-उम्मीद
आगे अब दस्त-ए-ना-रसा जाने
उम्मीद का दामन छोटा नहीं है, अब इसके आगे न पहुँच पाने वाला हाथ ही जाने कि वह क्या करता है।
11
जो हो अच्छा हज़ार अच्छों का
वाइ'ज़ उस बुत को तू बुरा जाने
हे उपदेशक, वह महबूब जो हज़ार अच्छे लोगों से भी बेहतर है, तू उस बुत को बुरा समझता है।
12
की मिरी क़द्र मिस्ल-ए-शाह-ए-दकन
किसी नव्वाब ने न राजा ने
दक्कन के बादशाह की तरह मेरी क़द्र न तो किसी नवाब ने की और न ही किसी राजा ने।
13
उस से उट्ठेगी क्या मुसीबत-ए-इश्क़
इब्तिदा को जो इंतिहा जाने
जो व्यक्ति इश्क़ की शुरुआत को ही उसका अंत समझ ले, वह इश्क़ की मुसीबतें और तकलीफें कैसे झेल पाएगा?
14
'दाग़' से कह दो अब न घबराओ
काम अपना बता हुआ जाने
'दाग़' से कह दो कि अब परेशान न हों और अपने काम को पूरा हुआ ही समझें।
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