इस तजाहुल का क्या ठिकाना है जान कर जो न मुद्दआ' जाने

“What bounds could there be to such feigned unawareness—knowing full well, they still pretend not to know my plea.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

इस जान-बूझकर अनजान बनने की क्या हद है, जो सब कुछ जानते हुए भी दिल के मक़सद को न समझने का दिखावा करे।

विस्तार

यहाँ शायर महबूब की मासूमियत भरी अदा यानी 'तजाहुल' (जानबूझकर अनजान बनने) पर प्यार भरी चुटकी ले रहा है। महबूब आशिक़ के दिल का सारा दर्द और उसकी मुराद बखूबी जानता है, फिर भी इस तरह बेपरवाह बना रहता है मानो कुछ समझ ही न रहा हो। यह अनदेखी कोई बेरुखी नहीं, बल्कि हुस्न का वह नाज़-नख़रा है जो आशिक़ को तड़पाता भी है और उसका दिल भी जीत लेता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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