ख़िदमत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ कर ज़ाहिद तू अब इंसान हुआ जाता है

“Go serve the master of the tavern, O ascetic—for now, at last, you are becoming human.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

ऐ ज़ाहिद, तू मैख़ाने के बुज़ुर्ग (पीर-ए-मुग़ाँ) की ख़िदमत कर, क्योंकि अब तू आख़िरकार एक सच्चा इंसान बनने जा रहा है।

विस्तार

यहाँ शायर सूखी धार्मिकता और दिखावे के परहेजगार (ज़ाहिद) पर एक गहरी और मीठी चुटकी ले रहा है। सूफ़ी शायरी में 'पीर-ए-मुग़ाँ' यानी मैख़ाने का बुज़ुर्ग उस सच्चे मुर्शिद का प्रतीक है जो इंसान को बेपनाह मुहब्बत, दर्द और आजिज़ी सिखाता है। शायर ज़ाहिद से कहता है कि अपनी बेजान कट्टरता छोड़कर इश्क़ की राह चुनो, क्योंकि जब दिल में दूसरों के लिए हमदर्दी और एहसास जागते हैं, तभी कोई शख़्स वाकई एक सच्चा 'इंसान' बन पाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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ख़िदमत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ कर ज़ाहिद | Sukhan AI