“It was not wiped clean from her heart to leave it free of stain; the morning breeze dispersed my dust, scattering it in vain.”
सुबह की हवा ने मेरी ख़ाک को यूँ ही बिखेर कर बेकार कर दिया, उसने मुझे महबूब के दिल से भी नहीं मिटाया ताकि उसका दिल साफ़ हो जाता।
यहाँ शायर अपने वजूद और यादों को एक बारीक धूल यानी 'ग़ुबार' के रूप में देख रहा है। वह सुबह की हवा (सबा) से शिकवा करता है कि उसने महबूब के दिल से इस ग़ुबार को साफ़ करके कोई सुकून नहीं दिया, बल्कि उसकी राख को बेमक़सद चारों तरफ बिखेर कर और परेशान कर दिया। यह अधूरा मिटने का दर्द है—जहाँ आशिक़ का वजूद ख़त्म होकर भी चैन नहीं पाता, बल्कि दर-ब-दर भटकता रह जाता है।
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