न उस के दिल से मिटाया कि साफ़ हो जाता सबा ने ख़ाक परेशाँ मिरा ग़ुबार किया

“It was not wiped clean from her heart to leave it free of stain; the morning breeze dispersed my dust, scattering it in vain.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

सुबह की हवा ने मेरी ख़ाک को यूँ ही बिखेर कर बेकार कर दिया, उसने मुझे महबूब के दिल से भी नहीं मिटाया ताकि उसका दिल साफ़ हो जाता।

विस्तार

यहाँ शायर अपने वजूद और यादों को एक बारीक धूल यानी 'ग़ुबार' के रूप में देख रहा है। वह सुबह की हवा (सबा) से शिकवा करता है कि उसने महबूब के दिल से इस ग़ुबार को साफ़ करके कोई सुकून नहीं दिया, बल्कि उसकी राख को बेमक़सद चारों तरफ बिखेर कर और परेशान कर दिया। यह अधूरा मिटने का दर्द है—जहाँ आशिक़ का वजूद ख़त्म होकर भी चैन नहीं पाता, बल्कि दर-ब-दर भटकता रह जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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