ग़ज़ल
ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया
غضب کیا ترے وعدے پہ اعتبار کیا
यह ग़ज़ल झूठे वादों पर विश्वास करने के दर्द और बेवफ़ाई से उपजी विरह-वेदना को बयां करती है। शायर पूरी रात प्रियतम के इंतज़ार के पछतावे और अपनी ही वफ़ा के कारण मिली शर्मिंदगी का मार्मिक चित्रण करता है।
Source: rekhta · HI
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1
ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
मैंने तुम्हारे वादे पर भरोसा करके बहुत बड़ी भूल की और पूरी रात क़यामत का इंतज़ार करता रहा।
2
किसी तरह जो न उस बुत ने ए'तिबार किया
मिरी वफ़ा ने मुझे ख़ूब शर्मसार किया
जब उस पत्थर दिल महबूब ने किसी भी तरह मुझ पर भरोसा नहीं किया, तो मेरी अपनी ही वफ़ा ने मुझे बहुत शर्मिंदा किया।
3
हँसा हँसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया
तसल्लियाँ मुझे दे दे के बे-क़रार किया
मिलन की रात मुझे हँसा-हँसा कर आँसू बहाने पर मजबूर कर दिया और बार-बार तसल्ली देकर मुझे और भी बेचैन कर दिया।
4
ये किस ने जल्वा हमारे सर-ए-मज़ार किया
कि दिल से शोर उठा हाए बे-क़रार किया
यह किसने मेरी मज़ार (क़ब्र) पर अपना जलवा दिखाया है कि मेरे दिल से यह चीख़ उठने लगी कि हाय, मुझे फिर से बेचैन कर दिया।
5
सुना है तेग़ को क़ातिल ने आब-दार किया
अगर ये सच है तो बे-शुबह हम पे वार किया
सुना है कि क़ातिल ने अपनी तलवार तेज़ की है; अगर यह सच है, तो निःसंदेह उसने हम पर ही वार किया है।
6
न आए राह पे वो इज्ज़ बे-शुमार किया
शब-ए-विसाल भी मैं ने तो इंतिज़ार किया
मैंने बेहद आजिज़ी और मिन्नतें कीं फिर भी वे राज़ी न हुए, यहाँ तक कि मिलन की रात भी मुझे सिर्फ़ इंतज़ार ही करना पड़ा।
7
तुझे तो वादा-ए-दीदार हम से करना था
ये क्या किया कि जहाँ को उमीद-वार किया
तुम्हें तो सिर्फ़ मुझसे अपने दीदार (मुलाक़ात) का वादा करना था, मगर यह तुमने क्या किया कि पूरी दुनिया को ही अपनी झलक पाने की उम्मीद में लगा दिया।
8
ये दिल को ताब कहाँ है कि हो मआल-अंदेश
उन्हों ने वअ'दा किया इस ने ए'तिबार किया
इस दिल में इतनी हिम्मत कहाँ कि अंजाम के बारे में सोचे। उन्होंने वादा किया और इसने उस पर भरोसा कर लिया।
9
कहाँ का सब्र कि दम पर है बन गई ज़ालिम
ब तंग आए तो हाल-ए-दिल आश्कार किया
हे ज़ालिम, अब सब्र कैसा जब बात जान पर बन आई है; जब मैं हद से ज़्यादा तंग आ गया, तो मैंने अपने दिल का हाल ज़ाहिर कर दिया।
10
तड़प फिर ऐ दिल-ए-नादाँ कि ग़ैर कहते हैं
अख़ीर कुछ न बनी सब्र इख़्तियार किया
ऐ नादान दिल! तू फिर से तड़प उठ, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी ताना दे रहे हैं कि जब आख़िरकार उससे कुछ न बन पड़ा, तो उसने लाचार होकर सब्र कर लिया।
11
मिले जो यार की शोख़ी से उस की बेचैनी
तमाम रात दिल-ए-मुज़्तरिब को प्यार किया
चूँकि यह बेचैनी महबूब की शोख़ी की वजह से मिली थी, इसलिए मैंने पूरी रात अपने बेचैन और तड़पते दिल को प्यार व दुलार दिया।
12
भुला भुला के जताया है उन को राज़-ए-निहाँ
छुपा छुपा के मोहब्बत को आश्कार किया
मैंने बार-बार भूलने का दिखावा करके उन्हें अपना छिपा हुआ राज़ बता दिया, और अपनी मोहब्बत को छुपाने की कोशिश करते-करते उसे पूरी तरह ज़ाहिर कर दिया।
13
न उस के दिल से मिटाया कि साफ़ हो जाता
सबा ने ख़ाक परेशाँ मिरा ग़ुबार किया
सुबह की हवा ने मेरी ख़ाک को यूँ ही बिखेर कर बेकार कर दिया, उसने मुझे महबूब के दिल से भी नहीं मिटाया ताकि उसका दिल साफ़ हो जाता।
14
हम ऐसे महव-ए-नज़ारा न थे जो होश आता
मगर तुम्हारे तग़ाफ़ुल ने होश्यार किया
मैं आपके दीदार में इस तरह खोया हुआ था कि मुझे होश ही न आता, लेकिन आपकी बेरुखी और उपेक्षा ने मुझे सचेत कर दिया।
15
हमारे सीने में जो रह गई थी आतिश-ए-हिज्र
शब-ए-विसाल भी उस को न हम-कनार किया
हमारे सीने में जुदाई की जो आग बाकी रह गई थी, मिलन की रात भी उसे आलिंगन में नहीं लिया जा सका।
16
रक़ीब ओ शेवा-ए-उल्फ़त ख़ुदा की क़ुदरत है
वो और इश्क़ भला तुम ने ए'तिबार किया
रक़ीब और प्रेम का तौर-तरीक़ा, यह भी ईश्वर की अजीब माया है। वह और सच्चा प्यार, भला तुमने उसकी बात पर कैसे भरोसा कर लिया?
17
ज़बान-ए-ख़ार से निकली सदा-ए-बिस्मिल्लाह
जुनूँ को जब सर-ए-शोरीदा पर सवार किया
जब मैंने अपने दीवाने सर पर जुनून को सवार किया, तो काँटों की ज़बान से 'बिस्मिल्लाह' की आवाज़ निकली मानो वे मेरे ज़ख़्मी होने की शुरुआत का स्वागत कर रहे हों।
18
तिरी निगह के तसव्वुर में हम ने ऐ क़ातिल
लगा लगा के गले से छुरी को प्यार किया
ऐ क़ातिल, तुम्हारी निगाहों के ख़्याल में हमने छुरी को बार-बार अपने गले से लगाकर उससे प्यार किया।
19
ग़ज़ब थी कसरत-ए-महफ़िल कि मैं ने धोके में
हज़ार बार रक़ीबों को हम-कनार किया
महफ़िल में इतनी अधिक भीड़ थी कि धोखे या भूलवश मैंने हज़ारों बार अपने प्रतिद्वंद्वियों (रक़ीबों) को ही गले लगा लिया।
20
हुआ है कोई मगर उस का चाहने वाला
कि आसमाँ ने तिरा शेवा इख़्तियार किया
लगता है कोई आसमान को भी चाहने लगा है, इसीलिए तो आसमान ने भी तुम्हारे ही तौर-तरीके और आदतें अपना ली हैं।
21
न पूछ दिल की हक़ीक़त मगर ये कहते हैं
वो बे-क़रार रहे जिस ने बे-क़रार किया
हमारे दिल की हालत मत पूछो, बस हम इतना ही कहते हैं कि जिसने हमें बेचैन किया है, वह खुद भी बेचैन रहे।
22
जब उन को तर्ज़-ए-सितम आ गए तो होश आया
बुरा हो दिल का बुरे वक़्त होश्यार किया
मुझे होश तब आया जब उन्हें ज़ुल्म करने के तरीके आ गए; इस दिल का बुरा हो जिसने मुझे इतने गलत और बुरे वक़्त पर सावधान किया।
23
फ़साना-ए-शब-ए-ग़म उन को इक कहानी थी
कुछ ए'तिबार किया कुछ न ए'तिबार किया
मेरे दुख की रात का हाल उनके लिए बस एक कहानी जैसा था, जिस पर उन्होंने आधा-अधूरा ही भरोसा किया।
24
असीरी दिल-ए-आशुफ़्ता रंग ला के रही
तमाम तुर्रा-ए-तर्रार तार तार किया
इस परेशान दिल की क़ैद आख़िरकार अपना असर दिखा कर ही रही और उसने उस शोख़ व चालाक ज़ुल्फ़ के हर एक तार को बिखेर दिया।
25
कुछ आ गई दावर-ए-महशर से है उम्मीद मुझे
कुछ आप ने मिरे कहने का ए'तिबार किया
मुझे क़यामत के दिन के मुंसिफ़ (ईश्वर) से कुछ उम्मीद बँध गई है, क्योंकि आपने मेरी बात पर कुछ भरोसा कर लिया है।
26
किसी के इश्क़-ए-निहाँ में ये बद-गुमानी थी
कि डरते डरते ख़ुदा पर भी आश्कार किया
किसी से गुप्त प्रेम करने में मन में ऐसा वहम और डर था कि मैंने बहुत डरते-डरते इसे ईश्वर के सामने भी ज़ाहिर किया।
27
फ़लक से तौर क़यामत के बन न पड़ते थे
अख़ीर अब तुझे आशोब-ए-रोज़गार किया
आसमान से क़यामत बरपा करने के तौर-तरीक़े ठीक से निभाए नहीं जा रहे थे, इसलिए आख़िरकार उसने तुम्हें इस ज़माने की आफ़त और हलचल बना दिया।
28
वो बात कर जो कभी आसमाँ से हो न सके
सितम किया तो बड़ा तू ने इफ़्तिख़ार किया
ऐसा कोई काम करके दिखा जो कभी आसमान से भी न हो सके; अगर तूने केवल ज़ुल्म ही किया है, तो इस पर इतना घमंड क्या करना।
29
बनेगा मेहर-ए-क़यामत भी एक ख़ाल-ए-सियाह
जो चेहरा 'दाग़'-ए-सियह-रू ने आश्कार किया
अगर इस काले चेहरे वाले 'दाग़' ने वह रोशन चेहरा ज़ाहिर कर दिया, तो क़यामत का प्रचंड सूरज भी उसके आगे सिर्फ़ एक काला तिल बनकर रह जाएगा।
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