ज़बान-ए-ख़ार से निकली सदा-ए-बिस्मिल्लाह जुनूँ को जब सर-ए-शोरीदा पर सवार किया

“From the tongue of the thorn arose the cry of 'Bismillah', the moment frenzy was mounted upon my wild and troubled head.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

जब मैंने अपने दीवाने सर पर जुनून को सवार किया, तो काँटों की ज़बान से 'बिस्मिल्लाह' की आवाज़ निकली मानो वे मेरे ज़ख़्मी होने की शुरुआत का स्वागत कर रहे हों।

विस्तार

इस शेर में शायर ने इश्क़ के जुनून की इंतहा को बहुत ही ख़ूबसूरत और हैरतअंगेज़ अंदाज़ में बयां किया है। जैसे ही आशिक़ के दीवाने सर पर जुनून सवार हुआ और वह सेहरा की तरफ़ निकला, राह के कांटों की ज़बान से 'बिस्मिल्लाह' की सदा गूंज उठी। गोया कांटे किसी भूखे की तरह मुंतज़िर थे कि कब यह दीवाना आए और वो उसका लहू चखकर अपनी दावत का आग़ाज़ करें।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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