“Such was the anxious dread in guarding this hidden love, that trembling with fear, I confessed it even to God.”
किसी से गुप्त प्रेम करने में मन में ऐसा वहम और डर था कि मैंने बहुत डरते-डरते इसे ईश्वर के सामने भी ज़ाहिर किया।
यहाँ शायर ने गुप्त प्रेम की उस नाज़ुक बेचैनी को बयां किया है, जहाँ आशिक़ अपने राज़ को छुपाने के लिए हद से ज़्यादा वहमी हो जाता है। यह मोहब्बत इतनी महफ़ूज़ और गोपनीय थी कि उसे उस सर्वव्यापी ख़ुदा के सामने ज़ाहिर करने में भी डर लग रहा था, जो दिलों के सारे भेद पहले से जानता है। यह इंसानी दिल के उस मासूम ख़ौफ़ की खूबसूरत तस्वीर है, जहाँ अपने प्यार को बचाने की धुन में बंदा दुआ माँगते हुए भी सहम जाता है।
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