हमारे सीने में जो रह गई थी आतिश-ए-हिज्र शब-ए-विसाल भी उस को न हम-कनार किया

“The fire of separation that had lingered in my breast, even the night of union could not draw into its embrace.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

हमारे सीने में जुदाई की जो आग बाकी रह गई थी, मिलन की रात भी उसे आलिंगन में नहीं लिया जा सका।

विस्तार

इस ख़ूबसूरत शेर में शायर जुदाई के उस गहरे दर्द की बात कर रहे हैं, जिसे मिलन की घड़ी भी पूरी तरह मिटा नहीं सकी। सीने में विरह की जो आग इतने लंबे अरसे से सुलग रही थी, वह इतनी गहरी हो चुकी थी कि महबूब के आगोश में आने पर भी दिल उस सुकून को महसूस न कर पाया। यह अहसास दिखाता है कि कभी-कभी दूरी का सदमा इंसान की रूह में इतना समा जाता है कि वस्ल की रात भी उस तड़प को बुझा नहीं पाती।

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