कहाँ का सब्र कि दम पर है बन गई ज़ालिम ब तंग आए तो हाल-ए-दिल आश्कार किया

“What room for patience now, O cruel one, when my very life is at stake? Pushed to despair at last, I laid bare the secret state of my heart.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

हे ज़ालिम, अब सब्र कैसा जब बात जान पर बन आई है; जब मैं हद से ज़्यादा तंग आ गया, तो मैंने अपने दिल का हाल ज़ाहिर कर दिया।

विस्तार

उर्दू शायरी में इश्क़ के दर्द को छुपाकर सब्र करना एक बड़ी ख़ूबी मानी जाती है, लेकिन इस शेर में आशिक़ अपनी बर्दाश्त की आख़िरी हद पार कर चुका है। जब बात जान पर बन आई और जीना मुहाल हो गया, तो सब्र का बाँध टूट गया। यह शेर उस बेबसी और लाचारी का बेहद सच्चा इज़हार है, जहाँ महबूब की बेरुख़ी से तंग आकर इंसान अपनी सारी ख़ामोशी तोड़ देता है और दिल का हाल बयां कर देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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