ग़ज़ब थी कसरत-ए-महफ़िल कि मैं ने धोके में हज़ार बार रक़ीबों को हम-कनार किया

“So overwhelming was the gathering's crowd that in delusion, a thousand times did I take my rivals into my embrace.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

महफ़िल में इतनी अधिक भीड़ थी कि धोखे या भूलवश मैंने हज़ारों बार अपने प्रतिद्वंद्वियों (रक़ीबों) को ही गले लगा लिया।

विस्तार

ज़रा सोचिए एक ऐसी खचाखच भरी महफ़िल, जहाँ हर तरफ़ भारी भीड़ हो और आशिक़ की नज़रें सिर्फ़ अपने महबूब को ढूँढ रही हों। शायर बड़े ही दिलचस्प और चुटीले अंदाज़ में बयान करता है कि उस बेचैन दीवानगी में उसे ऐसा धोखा हुआ कि उसने महबूब के ख़याल में अपने ही रक़ीबों (प्रतिद्वंद्वियों) को बार-बार गले लगा लिया। यह शेर इश्क़ की उस मदहोशी और तड़प को दिखाता है, जहाँ इंसान चाहत की शिद्दत में अपने और पराए की पहचान तक भूल बैठता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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