इन आँखों ने क्या क्या तमाशा न देखा हक़ीक़त में जो देखना था न देखा

“What countless spectacles these eyes have not beheld; yet in truth, that which was meant to be seen remained unseen.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

इन आँखों ने दुनिया के न जाने कितने तमाशे देखे, लेकिन हक़ीक़त में जो चीज़ वास्तव में देखने लायक थी, वही नहीं देखी।

विस्तार

यह शेर ज़िंदगी के एक बड़े संजीदा पहलू को छूता है—कि हम दुनिया के रंग-तमाशे और चमक-दमक तो खूब देखते रहे, पर जो असली सच था, उसी को देखने से चूक गए। यहाँ 'तमाशा' दुनिया के छलावे और सतही आकर्षण का प्रतीक है, जबकि 'हक़ीक़त' उस गहरे आत्मिक सत्य, परमात्मा या सच्चे प्रेम की ओर इशारा करती है। शायर बहुत सादगी से यह अफ़सोस बयां करता है कि सब कुछ देख लेने के बाद भी हम जीवन की वास्तविक गहराई को कभी जान ही नहीं पाए।

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