ग़ज़ल
इन आँखों ने क्या क्या तमाशा न देखा
ان آنکھوں نے کیا کیا تماشا نہ دیکھا
यह ग़ज़ल सांसारिक दिखावों की व्यर्थता और वास्तविक आध्यात्मिक दृष्टि के महत्व को रेखांकित करती है। इसमें महबूब के दीदार के बाद द्वैत भाव के समाप्त होने और आत्मिक एकाकारता की गहरी अनुभूति को दार्शनिक अंदाज़ में व्यक्त किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
इन आँखों ने क्या क्या तमाशा न देखा
हक़ीक़त में जो देखना था न देखा
इन आँखों ने दुनिया के न जाने कितने तमाशे देखे, लेकिन हक़ीक़त में जो चीज़ वास्तव में देखने लायक थी, वही नहीं देखी।
2
तुझे देख कर वो दुई उठ गई है
कि अपना भी सानी न देखा न देखा
तुम्हें देखकर अलगाव और द्वैत का भाव समाप्त हो गया है, यहाँ तक कि मैंने अपने जैसा भी कोई दूसरा कभी नहीं देखा।
3
उन आँखों के क़ुर्बान जाऊँ जिन्हों ने
हज़ारों हिजाबों में परवाना देखा
मैं उन आँखों पर न्योछावर जाऊँ जिन्होंने हज़ारों पर्दों के बीच भी परवाने को देख लिया।
4
न हिम्मत न क़िस्मत न दिल है न आँखें
न ढूँडा न पाया न समझा न देखा
मेरे पास न हिम्मत है, न क़िस्मत, न दिल है और न आँखें; इसी वजह से न मैंने कभी कुछ ढूँढा, न पाया, न समझा और न ही देखा।
5
मरीज़ान-ए-उल्फ़त की क्या बे-कसी है
मसीहा को भी चारा-फ़रमा न देखा
इश्क़ के बीमारों की कैसी बेबसी है कि मसीहा (इलाज करने वाले) को भी कभी उनका इलाज करते हुए नहीं देखा गया।
6
बहुत दर्द-मंदों को देखा है तू ने
ये सीना ये दिल ये कलेजा न देखा
तुमने दर्द सहने वाले बहुत से लोगों को देखा होगा, लेकिन तुमने ऐसा सीना, ऐसा दिल और ऐसा कलेजा कभी नहीं देखा।
7
वो कब देख सकता है उस की तजल्ली
जिस इंसान ने अपना ही जल्वा न देखा
जिस इंसान ने अभी तक अपना ही रूप या आंतरिक सौंदर्य नहीं देखा, वह ईश्वर के दिव्य प्रकाश को कभी नहीं देख सकता।
8
बहुत शोर सुनते थे इस अंजुमन का
यहाँ आ के जो कुछ सुना था न देखा
हम इस महफ़िल की बहुत चर्चा सुनते थे, लेकिन यहाँ आकर हमने वैसा कुछ भी नहीं देखा जो सुना था।
9
सफ़ाई है बाग़-ए-मोहब्बत में ऐसी
कि बाद-ए-सबा ने भी तिनका न देखा
मोहब्बत के बाग़ में ऐसी सफ़ाई (वीरानी) है कि सुबह की ठंडी हवा को भी वहाँ एक तिनका तक दिखाई नहीं दिया।
10
उसे देख कर और को फिर जो देखे
कोई देखने वाला ऐसा न देखा
मैंने ऐसा कोई देखने वाला नहीं देखा जो उस महबूब को देखने के बाद फिर किसी और को देखे।
11
वो था जल्वा-आरा मगर तू ने मूसा
न देखा न देखा न देखा न देखा
वह अपने पूरे नूर और जलाल के साथ प्रकट था, लेकिन ऐ मूसा, तुमने उसे बिल्कुल नहीं देखा, नहीं देखा, नहीं देखा और नहीं देखा।
12
गया कारवाँ छोड़ कर मुझ को तन्हा
ज़रा मेरे आने का रस्ता न देखा
कारवाँ मुझे अकेला छोड़ कर चला गया और उसने मेरे आने का ज़रा सा भी इंतज़ार नहीं किया।
13
कहाँ नक़्श-ए-अव्वल कहाँ नक़्श-ए-सानी
ख़ुदा की ख़ुदाई में तुझ सा न देखा
न कोई पहला रूप तुम्हारे जैसा है और न ही उसकी कोई दूसरी प्रति; ईश्वर की इस पूरी दुनिया में मैंने तुम्हारे जैसा कोई नहीं देखा।
14
तिरी याद है या है तेरा तसव्वुर
कभी 'दाग़' को हम ने तन्हा न देखा
चाहे तुम्हारी याद हो या तुम्हारा ख़याल, हमने 'दाग़' को कभी अकेला नहीं देखा।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
