“Neither courage nor fate, neither heart nor eyes have I; I never sought, never found, never understood, nor ever saw.”
मेरे पास न हिम्मत है, न क़िस्मत, न दिल है और न आँखें; इसी वजह से न मैंने कभी कुछ ढूँढा, न पाया, न समझा और न ही देखा।
यह शेर बेबसी और आत्म-स्वीकृति की एक बेहद खूबसूरत और दर्दभरी दास्तान है, जहाँ शायर अपनी कमियों को पूरी ईमानदारी से कबूल करता है। पहले मिसरे की चार कमियाँ दूसरे मिसरे के चार नतीजों से सीधे जुड़ी हैं—न हिम्मत थी तो ढूँढ न सके, न किस्मत थी तो कुछ पा न सके, न दिल था तो समझ न पाए, और न आँखें थीं तो देख न सके। यह शेर किसी करीबी दोस्त की उस गहरी आह की तरह लगता है, जो जिंदगी से महरूम रह जाने का इल्जाम जमाने पर मढ़ने के बजाय अपनी ही लाचारी पर आँसू बहाता है।
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