“What utter helplessness the victims of love endure—even the Messiah was never seen to offer them a cure.”
इश्क़ के बीमारों की कैसी बेबसी है कि मसीहा (इलाज करने वाले) को भी कभी उनका इलाज करते हुए नहीं देखा गया।
उर्दू शायरी में 'मसीहा' उस चमत्कारिक हकीम का प्रतीक है जो मुर्दों में भी जान फूंक सकता है, लेकिन यह शेर इश्क़ के दर्द की अनोखी लाचारी दिखाता है। दिल के मरीज़ों की बेबसी तो देखिए कि उनकी बीमारी के आगे वह मसीहा भी बेअसर और लाचार नज़र आता है। यह शेर बड़ी नज़ाकत से बयां करता है कि मोहब्बत का रोग ऐसा है, जिसका इलाज दुनिया की किसी भी दवा या करिश्मे में नहीं है।
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