“How could one ever behold His divine radiance, who has not yet witnessed their own inner splendor?”
जिस इंसान ने अभी तक अपना ही रूप या आंतरिक सौंदर्य नहीं देखा, वह ईश्वर के दिव्य प्रकाश को कभी नहीं देख सकता।
यह शेर सूफियाना फलसफे की एक बेहद खूबसूरत बात कहता है—ईश्वर की 'तजल्ली' यानी उसके दिव्य प्रकाश को वही पहचान सकता है, जिसने पहले अपने भीतर के नूर को देखा हो। जब तक इंसान अपनी ही रूह की खूबसूरती और अपनी हस्ती से बेखबर है, तब तक कायनात की सबसे बड़ी सच्चाई भी उसकी आँखों से ओझल रहेगी। खुदा को पाने का सफर बाहर की दुनिया में भटकने से नहीं, बल्कि सबसे पहले खुद को जानने से शुरू होता है।
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