“Gazing upon you, all sense of duality has ceased to be; such that even of myself, no equal did I ever see.”
तुम्हें देखकर अलगाव और द्वैत का भाव समाप्त हो गया है, यहाँ तक कि मैंने अपने जैसा भी कोई दूसरा कभी नहीं देखा।
यह शेर इश्क़ और सूफ़ी तसव्वुफ़ के उस शिखर को छूता है जहाँ 'तू' और 'मैं' का फ़र्क़ पूरी तरह मिट जाता है। महबूब के दीदार ने दो होने के भ्रम यानी 'दुई' को ऐसे ख़त्म कर दिया कि दोनों एक ही हक़ीक़त बन गए। इस कमाल की एकात्मता में आशिक़ को एहसास होता है कि जब महबूब बेमिसाल है और हम दोनों एक हैं, तो फिर इस पूरी कायनात में अपना भी कोई सानी या जोड़ नहीं बचा।
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