“In Paradise, I ask the houri fair: Do lovely idols hold no dominion here?”
मैं जन्नत में हूर से पूछता हूँ कि क्या इस जगह सुंदरियों (बुतों) की हुकूमत या असर नहीं चलता।
इस शेर में एक बड़ा ही दिलचस्प और शोख़ अंदाज़ है, जहाँ आशिक़ जन्नत पहुँचकर भी अपने दुनियावी महबूबों को नहीं भूला है। उर्दू शायरी में 'बुत' उस संगदिल और हसीन महबूब को कहते हैं जिसकी अदाओं में एक बेपरवाह कशिश होती है। शायर हूर से मासूमियत से पूछ रहा है कि क्या यहाँ उन ज़मीनी हुस्न वालों की हुकूमत नहीं चलती—यानी उनके नख़रों और उस मीठे दर्द के बिना जन्नत का सारा सुकून भी उसे कुछ अधूरा सा लगता है।
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