जल्वे मिरी निगाह में कौन-ओ-मकाँ के हैं मुझ से कहाँ छुपेंगे वो ऐसे कहाँ के हैं

“All splendors of the universe are gathered in my sight; / Where can they ever hide from me—from whence is such their might?”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

सारे संसार के जलवे मेरी आँखों के सामने हैं, वे भला मुझसे कहाँ छुप सकते हैं और उनकी इतनी बिसात कहाँ कि मुझसे ओझल रहें।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ का एक अनोखा और ख़ुद्दार अंदाज़ झलकता है, जहाँ वह बड़े नाज़ से कहता है कि सारी कायनात की रौनक़ें तो उसकी अपनी नज़र में सिमटी हुई हैं। जब पूरा ब्रह्मांड ही उसकी निगाह का दायरा बन चुका है, तो महबूब भला उससे छुपकर कहाँ जा सकता है? यह सिर्फ़ हुस्न और इश्क़ की चुलबुली तकरार नहीं, बल्कि एक सूफ़ी अहसास भी है जहाँ महबूब का नूर हर ज़र्रे में साफ़ दिखाई देता है।

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