ग़ज़ल
जल्वे मिरी निगाह में कौन-ओ-मकाँ के हैं
جلوے مری نگاہ میں کون و مکاں کے ہیں
यह ग़ज़ल कायनात में महबूब के सर्वव्यापी जलवों और अंतर्मन के अनकहे दर्द को दर्शाती है। शायर का मानना है कि महबूब की ख़ूबसूरती उसकी निगाहों से छुप नहीं सकती, जबकि दिल के भीतर सुलगते इश्क़ के राज़ और पीड़ा ख़ामोशी में बंधी हुई है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
जल्वे मिरी निगाह में कौन-ओ-मकाँ के हैं
मुझ से कहाँ छुपेंगे वो ऐसे कहाँ के हैं
सारे संसार के जलवे मेरी आँखों के सामने हैं, वे भला मुझसे कहाँ छुप सकते हैं और उनकी इतनी बिसात कहाँ कि मुझसे ओझल रहें।
2
खुलते नहीं हैं राज़ जो सोज़-ए-निहाँ के हैं
क्या फूटने के वास्ते छाले ज़बाँ के हैं
अंदरूनी जलन के राज़ खुल नहीं पा रहे हैं; क्या ज़ुबान के छाले फूटने के लिए ही हैं ताकि यह भेद ज़ाहिर हो सकें?
3
करते हैं क़त्ल वो तलब-ए-मग़फ़िरत के बाद
जो थे दुआ के हाथ वही इम्तिहाँ के हैं
वे पहले माफ़ी माँगते हैं और फिर क़त्ल करते हैं; जो हाथ कभी दुआ के लिए उठते थे, अब वही इम्तिहान लेने वाले बन गए हैं।
4
जिस रोज़ कुछ शरीक हुई मेरी मुश्त-ए-ख़ाक
उस रोज़ से ज़मीं पे सितम आसमाँ के हैं
जिस दिन से मेरी मुट्ठी भर धूल इस ज़मीन में शामिल हुई है, उसी दिन से आसमान के सारे सितम इस ज़मीन पर हो रहे हैं।
5
बाज़ू दिखाए तुम ने लगा कर हज़ार हाथ
पूरे पड़े तो वो भी बहुत इम्तिहाँ के हैं
तुमने हज़ार हाथ जोड़कर अपनी ताक़त का प्रदर्शन किया है; और अगर वे पूरे भी पड़ गए, तो उन्हें भी बहुत कड़े इम्तिहान से गुज़रना होगा।
6
नासेह के सामने कभी सच बोलता नहीं
मेरी ज़बाँ में रंग तुम्हारी ज़बाँ के हैं
मैं नसीहत देने वाले के सामने कभी सच नहीं बोलता, क्योंकि मेरी ज़ुबान पर तुम्हारी ही बातों का रंग चढ़ा हुआ है।
7
कैसा जवाब हज़रत-ए-दिल देखिए ज़रा
पैग़ाम-बर के हाथ में टुकड़े ज़बाँ के हैं
ऐ दिल, तुम किस जवाब की उम्मीद कर रहे हो, ज़रा देखो तो सही कि संदेशवाहक के हाथ में उसकी अपनी कटी हुई ज़ुबान के टुकड़े हैं।
8
क्या इज़्तिराब-ए-शौक़ ने मुझ को ख़जिल किया
वो पूछते हैं कहिए इरादे कहाँ के हैं
मेरी तड़प और बेचैनी ने मुझे बहुत शर्मिंदा कर दिया, जब उन्होंने मुझसे पूछ लिया कि कहिए आपके इरादे क्या हैं।
9
आशिक़ तिरे अदम को गए किस क़दर तबाह
पूछा हर एक ने ये मुसाफ़िर कहाँ के हैं
तेरे आशिक़ मौत की ओर इस कदर बर्बाद हालत में गए कि उन्हें देखकर हर किसी ने यही पूछा कि ये मुसाफ़िर आख़िर कहाँ के रहने वाले हैं।
10
हर-चंद 'दाग़' एक ही अय्यार है मगर
दुश्मन भी तो छटे हुए सारे जहाँ के हैं
यद्यपि 'दाग़' अकेला ही एक बड़ा चालाक इंसान है, लेकिन उसके दुश्मन भी पूरी दुनिया के चुने हुए दुष्ट और छंटे हुए लोग हैं।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
