जिस रोज़ कुछ शरीक हुई मेरी मुश्त-ए-ख़ाक उस रोज़ से ज़मीं पे सितम आसमाँ के हैं

“Ever since a handful of my dust mingled with the earth, the heavens have unleashed their wrath upon this very ground.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

जिस दिन से मेरी मुट्ठी भर धूल इस ज़मीन में शामिल हुई है, उसी दिन से आसमान के सारे सितम इस ज़मीन पर हो रहे हैं।

विस्तार

शायर यहाँ बड़े दर्द और हल्की-सी नज़ाकत के साथ अपनी क़िस्मत का शिकवा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब से उनके वजूद की 'मुश्त-ए-ख़ाक' यानी मुट्ठी भर मिट्टी इस ज़मीन में शामिल हुई है, तभी से आसमान इस धरती पर क़हर ढा रहा है। मानो ज़माने और तक़दीर की सारी रंजिशें सिर्फ़ उन्हीं से हैं, और उनकी बदक़िस्मती का ख़ामियाज़ा अब पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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