काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है मुझ को ख़बर नहीं मिरी मिट्टी कहाँ की है

“Sometimes I yearn for the Kaaba, sometimes for the street of idols; I do not know from what soil the clay of my being was drawn.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

कभी मुझे काबा जाने की चाहत होती है और कभी महबूबों की गली की; मुझे नहीं पता कि मेरे वजूद की मिट्टी कहाँ से ली गई है।

विस्तार

इस शेर में दिल की उस दिलचस्प कशमकश को बयां किया गया है, जहाँ इंसान कभी खुदा की इबादत (काबा) की तरफ खिंचता है, तो कभी हुस्न और सांसारिक प्रेम (कू-ए-बुताँ) का दीवाना हो जाता है। पुरानी मान्यता है कि इंसान जिस मिट्टी से गढ़ा गया है, वही उसकी फितरत और किस्मत तय करती है। शायर बड़ी सादगी से खुद से ही सवाल करता है कि आख़िर वह किस अजीब मिट्टी का बना है, जो न पूरी तरह नेकी की राह पर टिक पाता है और न ही दुनियावी शौक छोड़ पाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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