ग़ज़ल
काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है
کعبے کی ہے ہوس کبھی کوئے بتاں کی ہے
यह ग़ज़ल मानवीय मन के अंतर्द्वंद्व और बेचैनी को खूबसूरती से दर्शाती है, जहाँ दिल कभी भक्ति (काबा) तो कभी सांसारिक प्रेम (कू-ए-बुताँ) की ओर आकर्षित होता है। शायर ने चुलबुलेपन और नज़ाकत के साथ प्रेम की तड़प, महबूब की बेनियाज़ी और अपनी अनिश्चित नियति का इज़हार किया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है
मुझ को ख़बर नहीं मिरी मिट्टी कहाँ की है
कभी मुझे काबा जाने की चाहत होती है और कभी महबूबों की गली की; मुझे नहीं पता कि मेरे वजूद की मिट्टी कहाँ से ली गई है।
2
सुन के मिरा फ़साना उन्हें लुत्फ़ आ गया
सुनता हूँ अब कि रोज़ तलब क़िस्सा-ख़्वाँ की है
मेरी दास्तान सुनकर उन्हें इतना मज़ा आया कि अब मैं सुन रहा हूँ कि हर रोज़ उस दास्तान सुनाने वाले को दरबार में बुलाया जाता है।
3
पैग़ाम-बर की बात पर आपस में रंज क्या
मेरी ज़बान की है न तुम्हारी ज़बाँ की है
संदेशवाहक (पैग़ामबर) की कही बात पर आपस में नाराज़गी कैसी? यह बात न तो मेरी ज़ुबान से निकली है और न तुम्हारी ज़ुबान से।
4
कुछ ताज़गी हो लज़्ज़त-ए-आज़ार के लिए
हर दम मुझे तलाश नए आसमाँ की है
दर्द और पीड़ा के आनंद में कुछ नयापन बना रहे, इसी वजह से मुझे हर पल एक नए आसमान की तलाश रहती है।
5
जाँ-बर भी हो गए हैं बहुत मुझ से नीम-जाँ
क्या ग़म है ऐ तबीब जो पूरी वहाँ की है
मुझ जैसे कई अधमरे लोग भी बचकर स्वस्थ हो चुके हैं, इसलिए ऐ हकीम! क्या दुख मनाना अगर ऊपर वाले के यहाँ से मेरी उम्र ही पूरी हो चुकी है।
6
हसरत बरस रही है हमारे मज़ार पर
कहते हैं सब ये क़ब्र किसी नौजवाँ की है
हमारे मज़ार पर इस क़दर हसरत और अफ़सोस बरस रहा है कि उसे देखकर सब यही कहते हैं कि यह किसी नौजवान की क़ब्र है।
7
वक़्त-ए-ख़िराम-ए-नाज़ दिखा दो जुदा जुदा
ये चाल हश्र की ये रविश आसमाँ की है
नाज़-ओ-अंदाज़ से चलते समय अलग-अलग दिखा दीजिए कि यह चाल क़यामत की है और यह अंदाज़ आसमान का है।
8
फ़ुर्सत कहाँ कि हम से किसी वक़्त तू मिले
दिन ग़ैर का है रात तिरे पासबाँ की है
तुम्हें कभी मुझसे मिलने की फ़ुर्सत कहाँ है, क्योंकि तुम्हारा दिन तो ग़ैरों (दूसरों) का है और रात तुम्हारे पहरेदार की है।
9
क़ासिद की गुफ़्तुगू से तसल्ली हो किस तरह
छुपती नहीं वो बात जो तेरी ज़बाँ की है
संदेशवाहक (क़ासिद) की बातों से मुझे कैसे तसल्ली मिल सकती है? जो बात तुम्हारी अपनी ज़बान से निकली हो, वह कभी छिप नहीं सकती।
10
जौर-ए-रक़ीब ओ ज़ुल्म-ए-फ़लक का नहीं ख़याल
तशवीश एक ख़ातिर-ए-ना-मेहरबाँ की है
मुझे रक़ीब के अत्याचारों और क़िस्मत के सितम की कोई परवाह नहीं है। मुझे बस अपने उस बेरहम महबूब के दिल की चिंता सता रही है।
11
सुन कर मिरा फ़साना-ए-ग़म उस ने ये कहा
हो जाए झूट सच यही ख़ूबी बयाँ की है
मेरे दुख की दास्तान सुनकर उसने बस इतना कहा कि झूठ भी सच लगने लगे, यही आपके बयाँ करने की ख़ूबी है।
12
दामन संभाल बाँध कमर आस्तीं चढ़ा
ख़ंजर निकाल दिल में अगर इम्तिहाँ की है
अपना दामन संभालो, कमर कसो और आस्तीनें चढ़ा लो; अगर दिल में आज़माने या इम्तिहान लेने की ठानी है, तो खंजर निकाल लो।
13
हर हर नफ़स में दिल से निकलने लगा ग़ुबार
क्या जाने गर्द-ए-राह ये किस कारवाँ की है
हर सांस के साथ दिल से धूल या गुबार निकलने लगा है; न जाने रास्ते की यह धूल किस गुज़रते हुए कारवाँ की है।
14
क्यूँकि न आते ख़ुल्द से आदम ज़मीन पर
मौज़ूँ वहीं वो ख़ूब है जो सुनते जहाँ की है
आदम जन्नत से ज़मीन पर क्यों न आते? इस दुनिया के बारे में जो कुछ सुना जाता है, वह यहीं पर सबसे ज़्यादा उपयुक्त और अच्छा लगता है।
15
तक़दीर से ये पूछ रहा हूँ कि इश्क़ में
तदबीर कोई भी सितम-ए-ना-गहाँ की है
मैं तक़दीर से यह पूछ रहा हूँ कि क्या इश्क़ में अचानक आने वाली मुसीबतों और ज़ुल्म का कोई उपाय या हल है।
16
उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं 'दाग़'
हिन्दोस्ताँ में धूम हमारी ज़बाँ की है
ऐ 'दाग़', उर्दू जिसे कहते हैं उसे वास्तव में हम ही जानते हैं, क्योंकि पूरे हिंदुस्तान में हमारी ही भाषा की शोहरत और धूम है।
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