“When walking in your graceful pride, show each distinctly clear: this stride belongs to Judgment Day, that to the turning sphere.”
नाज़-ओ-अंदाज़ से चलते समय अलग-अलग दिखा दीजिए कि यह चाल क़यामत की है और यह अंदाज़ आसमान का है।
शायर यहाँ महबूब की नाज़-ओ-अदा से भरी चाल की तारीफ़ में डूबकर कहते हैं कि ज़रा ठहरकर अलग-अलग दिखाओ कि तुम्हारी कौन-सी अदा क्या क़हर ढा रही है। तुम्हारा एक क़दम ऐसा लगता है मानो क़यामत आ गई हो, और दूसरा जैसे बदलते हुए आसमान की तक़दीर तय करने वाली रफ़्तार हो। यह महबूब की दिलकश चाल का एक बेहद ख़ूबसूरत मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) है, जहाँ एक इंसान के चलने में पूरी कायनात का उथल-पुथल समाया हुआ है।
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