“When would you find the leisure to meet with me a while? / The day belongs to rivals, the night unto your guard.”
तुम्हें कभी मुझसे मिलने की फ़ुर्सत कहाँ है, क्योंकि तुम्हारा दिन तो ग़ैरों (दूसरों) का है और रात तुम्हारे पहरेदार की है।
इस शेर में आशिक़ का एक बेहद दर्दीला और मीठा शिकवा छुपा है कि महबूब की ज़िंदगी में उसके लिए कोई लम्हा ही नहीं बचा। दिन का उजाला ज़माने और रक़ीबों की महफ़िलों में बँट जाता है, और रात का सन्नाटा पहरेदारों की निगरानी की नज़र हो जाता है। शायर बड़ी नज़ाकत से यह तंज़ करता है कि जब सारा वक़्त गै़रों और पहरों में तक़सीम हो चुका हो, तो ख़ालिस मोहब्बत के लिए फ़ुर्सत कहाँ से निकलेगी।
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