जाँ-बर भी हो गए हैं बहुत मुझ से नीम-जाँ क्या ग़म है ऐ तबीब जो पूरी वहाँ की है

“Many half-dead like me have rallied and survived; what grief, O physician, if fate has reached the other side?”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

मुझ जैसे कई अधमरे लोग भी बचकर स्वस्थ हो चुके हैं, इसलिए ऐ हकीम! क्या दुख मनाना अगर ऊपर वाले के यहाँ से मेरी उम्र ही पूरी हो चुकी है।

विस्तार

इस शेर में शायर अपने हकीम (तबीब) को ढाढ़स बंधाते हुए ज़िंदगी और मौत की हक़ीक़त बयां कर रहा है। वह कहता है कि मेरे जैसे कितने ही अधमरे लोग दोबारा सेहतयाब होकर जी उठे हैं, इसलिए उम्मीद तो हमेशा रहती है, मगर यदि ऊपर वाले ने ज़िंदगी की मियाद ही पूरी लिख दी है तो फिर अफ़सोस कैसा? यहाँ मौत का कोई खौफ नहीं, बल्कि तक़दीर के फ़ैसले को बड़े ही सुकून और बेफिक्री से स्वीकार करने का अंदाज़ है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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