“"What did you say? Say it again—we will not listen to you!" / If you will not listen, then to such as you, we do not deign to speak!”
तुमने क्या कहा, ज़रा दोबारा कहना कि हम तुम्हारी बात नहीं सुनते? अगर तुम नहीं सुनते, तो हम भी तुम जैसे लोगों को अपनी बात नहीं सुनाते।
यह शेर आशिक़ और माशूक़ के बीच की दिलचस्प नोक-झोंक और आत्मसम्मान की शानदार मिसाल है। जब महबूब नाज़-ओ-अंदाज़ में आकर कहता है कि 'हम तुम्हारी बात नहीं सुनेंगे', तो शायर भी अपनी अना और इज़्ज़त-ए-नफ़्स पर आंच नहीं आने देता। वह तुरंत पलटकर जवाब देता है कि अगर तुम्हें क़द्र नहीं, तो हम भी तुम जैसे बेपरवाह लोगों को अपना हाल सुनाने की ज़हमत नहीं उठाते। इस तकरार में बाहर से ग़ुस्सा दिखता है, मगर अंदर मोहब्बत का गहरा खिंचाव छुपा है।
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