ग़ज़ल
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
عذر آنے میں بھی ہے اور بلاتے بھی نہیں
यह ग़ज़ल महबूब की बेरुखी और विरोधाभासी व्यवहार से उपजी आशिक़ की तड़प को दर्शाती है, जहाँ महबूब न तो मिलने आता है और न ही दूरी की कोई वजह बताता है। इसमें प्रेमी की लाचारी, शिकवे और उपेक्षा के गहरे दर्द को संजीदगी से व्यक्त किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं
उन्हें खुद आने में भी बहाने हैं और वे मुझे बुलाते भी नहीं, और न ही मुलाक़ात बंद करने का कारण बताते हैं।
2
मुंतज़िर हैं दम-ए-रुख़्सत कि ये मर जाए तो जाएँ
फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं
वे मेरे अंतिम समय का इंतज़ार कर रहे हैं कि मैं मर जाऊँ तो वे यहाँ से जाएँ, और फिर भी यह एहसान जताते हैं कि वे मुझे छोड़कर नहीं जा रहे हैं।
3
सर उठाओ तो सही आँख मिलाओ तो सही
नश्शा-ए-मय भी नहीं नींद के माते भी नहीं
कम से कम अपना सिर तो उठाओ और आँखें तो मिलाओ; तुम न तो शराब के नशे में हो और न ही नींद से मदहोश हो।
4
क्या कहा फिर तो कहो हम नहीं सुनते तेरी
नहीं सुनते तो हम ऐसों को सुनाते भी नहीं
तुमने क्या कहा, ज़रा दोबारा कहना कि हम तुम्हारी बात नहीं सुनते? अगर तुम नहीं सुनते, तो हम भी तुम जैसे लोगों को अपनी बात नहीं सुनाते।
5
ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
यह कैसा अजीब पर्दा है कि वे चिलमन से सटकर बैठे हैं; न तो पूरी तरह छिपते हैं और न ही खुलकर सामने आते हैं।
6
मुझ से लाग़र तिरी आँखों में खटकते तो रहे
तुझ से नाज़ुक मिरी नज़रों में समाते भी नहीं
मुझ जैसे कमज़ोर और दुबले लोग तुम्हारी आँखों में चुभते तो रहे, लेकिन तुम जैसे नाज़ुक लोग तो मेरी नज़रों में समा भी नहीं पाते हैं।
7
देखते ही मुझे महफ़िल में ये इरशाद हुआ
कौन बैठा है उसे लोग उठाते भी नहीं
महफ़िल में मुझे देखते ही यह हुक्म जारी हुआ कि यह कौन बैठा है और लोग इसे यहाँ से उठाते क्यों नहीं।
8
हो चुका क़त्अ तअ'ल्लुक़ तो जफ़ाएँ क्यूँ हों
जिन को मतलब नहीं रहता वो सताते भी नहीं
जब रिश्ता पूरी तरह खत्म हो चुका है, तो फिर यह जुल्म क्यों? जिन्हें किसी से कोई वास्ता या मतलब नहीं रहता, वे सताया भी नहीं करते।
9
ज़ीस्त से तंग हो ऐ 'दाग़' तो जीते क्यूँ हो
जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं
ऐ दाग़, अगर तुम ज़िंदगी से इतने तंग आ चुके हो तो फिर ज़िंदा क्यों हो? तुम्हें अपनी जान प्यारी भी नहीं है और तुम मरते भी नहीं हो।
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