ग़ज़ल

गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद न बेगाना-वार देख

گلزار ہست و بود نہ بیگانہ وار دیکھ
अल्लामा इक़बाल· Ghazal· 4 shers· radif: देख

इस ग़ज़ल में शायर मनुष्य को अस्तित्व के इस संसार को किसी अजनबी की तरह नहीं, बल्कि गहरी दृष्टि और चेतना के साथ देखने का आह्वान करता है। इसके साथ ही, यह जीवन की क्षणभंगुरता को चिंगारी के समान बताते हुए इस नश्वर जीवन की वास्तविकता को समय रहते समझने की प्रेरणा देती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद न बेगाना-वार देख है देखने की चीज़ इसे बार बार देख
इस अस्तित्व रूपी बाग को अजनबियों की तरह मत देखो; यह ऐसी चीज़ है जो देखने योग्य है, इसलिए इसे बार-बार देखो।
2
आया है तू जहाँ में मिसाल-ए-शरार देख दम दे न जाए हस्ती-ना-पाएदार देख
तुम इस संसार में एक चिंगारी की तरह आए हो, इसलिए सचेत होकर देखो; कहीं यह अस्थायी जीवन तुम्हें धोखा न दे जाए।
3
माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं तुम्हारा दीदार करने के योग्य नहीं हूँ, लेकिन तुम मेरी लगन और मेरा इंतज़ार तो देखो।
4
खोली हैं ज़ौक़-ए-दीद ने आँखें तिरी अगर हर रहगुज़र में नक़्श-ए-कफ़-ए-पा-ए-यार देख
अगर देखने की तड़प या चाहत ने तुम्हारी आँखें खोल दी हैं, तो हर रास्ते पर महबूब के पैरों के निशान देखो।
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