तन्हाई-ए-फ़िराक़ के क़ुर्बान जाइए मैं हूँ ख़याल-ए-यार है चश्म-ए-पुर-आब है

“O, blessed be this solitude of parting—here am I, the memory of my beloved, and eyes brimful of tears.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

जुदाई के इस अकेलेपन पर क़ुरबान जाऊँ, जहाँ केवल मैं हूँ, महबूब की याद है और आँसुओं से भरी आँखें हैं।

विस्तार

इस शेर में शायर जुदाई के अकेलेपन पर भी निसार होने की बात कह रहा है, क्योंकि यह अकेलापन खाली नहीं है। यहाँ महबूब जिस्मानी तौर पर भले मौजूद न हो, लेकिन तन्हाई के इस आलम में आशिक़, महबूब की यादें और अश्क-बार आँखें मिलकर एक मुकम्मल महफ़िल सजा लेती हैं। यह दर्द और उल्फ़त का वह खूबसूरत मोड़ है जहाँ विरह की कसक भी महबूब के अहसास से सराबोर होकर सुकून बन जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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